कोटा, 17 मार्च | दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान दुवारा श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन की कथा में ध्रुव प्रसंग, वराह अवतार एवं नरसिंह अवतार का मार्मिक वर्णन किया गया। कथा व्यास साध्वी पद्महस्ता भारती ने बताया कि श्रीमद्भागवत महापुराण में कहा गया है ज्ञानं निःश्रेयसार्थाय पुरुषस्य आत्मदर्शनम् तथा श्रीमद्भगवद्गीता में इसे अध्यात्म ज्ञान नित्यत्वं तत्वज्ञानार्थ दर्शनम् कहा गया है। अर्थात् सभी शास्त्र-ग्रंथों के अनुसार अध्यात्म का वास्तविक अर्थ तत्व रूप से भगवान का प्रत्यक्ष दर्शन करना है।
उन्होंने समझाया कि विज्ञान का वास्तविक अर्थ है जानना नहीं, बल्कि अनुभव करना। आर्ष ग्रंथों ने इस ज्ञान को परा विद्या कहा है, वहीं गीता इसे राजविद्या बताती है राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् यही ब्रह्मज्ञान है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण एवं कूर्म पुराण में माँ ने इसी दिव्य दृष्टि के माध्यम से अर्जुन और हिमवान को अपने वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराया। साध्वी ने एक सुंदर उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे एक छोटी सी माइक्रोचिप में हजारों गीगाबाइट डेटा संचित होता है, उसी प्रकार परमात्मा का समस्त ऐश्वर्य हमारे इस शरीर में विद्यमान है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम किसी अध्यात्म विज्ञानी पूर्ण सतगुरु से उस दिव्यता को decode करने की विधि जानें। आशुतोष महाराज की कृपा से आज अनेकों श्रद्धालु अपने ही भीतर परमात्मा का साक्षात्कार कर रहे हैं। इसलिए महापुरुषों ने परमात्मा को जानने और अनुभव करने पर बल दिया, जो केवल ब्रह्म ज्ञान द्वारा ही संभव है।
