जयपुर, 24 दिसम्बर | दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (डीजेजेएस) द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय शिव आराधन के पंचम एवं समापन दिवस का आयोजन अत्यंत श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक चेतना के वातावरण में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर शिव शृंगार, शिवरात्रि महोत्सव एवं भगवान शिव की नंदी (बैल) सवारी के माध्यम से धर्म, संयम और संस्कारों का गूढ़ संदेश प्रदान किया | सर्वप्रथम भगवान शिव के दिव्य श्रृंगार का भावपूर्ण वर्णन एवं दर्शन कराया गया। साध्वी लोकेशा भारती जी ने कहा कि शिव श्रृंगार केवल बाह्य अलंकरण नहीं, बल्कि आत्मा के शुद्धिकरण, वैराग्य, करुणा और संतुलन का प्रतीक है।भस्म, जटा, चंद्रमा, गंगा और रुद्राक्ष—ये सभी संकेत देते हैं कि शिव भोग में नहीं, बल्कि त्याग और चेतना में प्रतिष्ठित हैं। शिव शृंगार मानव को यह सिखाता है कि जीवन में सादगी, संयम और आत्मबोध ही वास्तविक सौंदर्य है।
इसके पश्चात शिवरात्रि महोत्सव के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए साध्वी जी ने कहा कि शिवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और विकार से विवेक की ओर जाने की रात्रि है। यह रात्रि आत्मचिंतन, साधना और शिव तत्व से जुड़ने का दिव्य अवसर प्रदान करती है। शिवरात्रि मानव को जागरण का संदेश देती है—बाह्य नहीं, बल्कि आंतरिक जागरण।इस अवसर पर भगवान शिव की नंदी (बैल) पर आरूढ़ सवारी के प्रसंग को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया। साध्वी जी ने कहा कि नंदी धर्म, सेवा, अनुशासन और सत्य का प्रतीक है। भगवान शिव का नंदी पर आरूढ़ होना यह दर्शाता है कि ईश्वर सदैव धर्म के आधार पर ही सृष्टि का संचालन करते हैं। उन्होंने कहा कि आज का मानव धर्माचरण को भूलता जा रहा है। जीवन में प्रगति तो है, परंतु संस्कार और नैतिक मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं। यही कारण है कि समाज में असंतुलन, तनाव और विघटन बढ़ रहा है।
