Wednesday, January 28, 2026
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पार्वती जन्मोत्सव एवं काम-दहन प्रसंग से मिला नारी सम्मान का सन्देश

जयपुर, 23 दिसम्बर | दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (डीजेजेएस) द्वारा आयोजित शिव कथा में आज कथा व्यास साध्वी लोकेशा भारती ने पार्वती जन्मोत्सव की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि माता पार्वती केवल भगवान शिव की अर्धांगिनी नहीं, बल्कि शक्ति, तप, त्याग, मर्यादा और संतुलन की सजीव प्रतीक हैं। उन्होंने बताया कि जिस प्रकार देवताओं ने सृष्टि के संतुलन हेतु पार्वती स्वरूप शक्ति का आवाहन किया, उसी प्रकार आज के समाज को भी नारी शक्ति के सम्मान, संरक्षण और पूर्ण स्वीकार्यता की नितांत आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यह अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि एक ओर राष्ट्र, समाज और राजनीति में नारी को शक्ति के रूप में स्वीकार किया जाता है, वहीं दूसरी ओर आज भी अनेक परिवारों में कन्या के जन्म को बोझ समझा जाता है। कन्या भ्रूण हत्या, घरेलू भेदभाव और सामाजिक असमानता इसी दोहरे मापदंड का परिणाम हैं। जब तक घर-घर में कन्या का सम्मान नहीं होगा, तब तक नारी सशक्तिकरण केवल शब्दों और नारों तक सीमित रह जाएगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि नारी शोषण केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक और वैचारिक भी है। असुरक्षा, अवमानना और भेदभाव—ये सभी विकृत चेतना के दुष्परिणाम हैं। समाज का वास्तविक संतुलन तभी संभव है जब नारी को सम्मान, सुरक्षा और समान अधिकार आत्मिक स्तर पर स्वीकार किए जाएँ। काम-दहन प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए साध्वी लोकेशा भारती जी ने कहा कि ‘काम’ केवल शारीरिक वासना नहीं, बल्कि हर वह विकार है जो विवेक, संयम और मानवीय मूल्यों को नष्ट कर देता है। भगवान शिव द्वारा काम का दहन आत्मसंयम, वैराग्य और चेतना की जागृति का प्रतीक है। जैसे भगवान शिव ने अपनी दिव्य दृष्टि से काम का दहन कर विकारों का नाश किया, उसी प्रकार आज दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी मानव को दिव्यचक्षु (दिव्य दृष्टि) प्रदान कर ईश्वर का साक्षात्कार करा रहे हैं। इस दिव्य दृष्टि से मनुष्य के भीतर छिपे काम, क्रोध, अहंकार एवं अन्य विकार नष्ट हो रहे हैं, जिससे मानव मन निर्मल, संतुलित और करुणामय बन रहा है।

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