जयपुर 16 अक्टूबर | सनातन धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व बताया गया है शरद पूर्णिमा का पर्व हर साल आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन मनाया जाता है । इस दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने और देवी लक्ष्मी की पूजा करने से सुख, समृद्धि और धन की प्राप्ति होती है। ऐसी मान्यता है कि अगर कोई भक्त शरद पूर्णिमा पर सच्चे मन से धन की देवी की उपासना करता है तो लक्ष्मी देवी उसे जीवन भर धन-अन्न के भंडार से भर देती हैं. कभी दरिद्रता नहीं आती है साथ ही इस पर्व का वैज्ञानिक महत्व इतना अधिक है कि यह रोग निदान एवं औषधि ग्रहण के लिए श्रेष्ठ समय है। शरद पूर्णिमा की चांदनी का रूप अनोखा एवं निराला होने से आयुर्वेद के मर्मज चिकित्सा एवं वैद्य अनेक रोगनाशक तथा स्वास्थ्यवर्द्धक औषधियों के योग इस समय तैयार करते हैं।
आयुर्वेद में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व
राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान की प्रोफेसर डा दुर्गावती देवी कहा कि आयुर्वेद में शरद ऋतु का अलग ही महत्व है। आयुर्वेद मतानुसार इस ऋतु में पित्त दोष का प्रकोप होता है इसलिए इस समय ठंडी और मीठी तासीर वाला भोजन करना चाहिए। इस पूरी ऋतु में चंद्रमा की किरणों का सेवन करना विशेष फलदाई बताया गया है क्योंकि इस समय अगस्त्य तारा उदित होता है। इसके कारण चंद्रमा की किरणों में औषधीय गुण आ जाते है और यह सभी प्रकार के जलों और भोजन को पित्तशामक बना देता है। पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा अपने पूर्ण गुणों और बल से युक्त होता है। अतः इस दिन खीर जो स्वयं मीठी होती है उसको पूर्ण गुणों और बल से युक्त चंद्रमा की किरणों में रखकर सेवन करने का विधान है। इस प्रकार की खीर विशेष रूप से पित्त दोष और उस से उत्पन्न होने वाली व्याधियों का शमन करने वाली होती है।
“शरद पूर्णिमा की रात में चंद्रमा की रोशनी से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा आती है | चंद्रमा की रोशनी में रखी खीर में औषधीय गुण आ जाते हैं | खीर में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन्स, और मिनरल्स शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं | इस खीर को खाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है | ”
डा दुर्गावती देवी, प्रोफेसर, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान
