जयपुर, 22 सितम्बर । दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन दुनियाभर के जैन मंदिरों में उत्तम तप धर्म पावन पर्व मनाया गया, इस अवसर पर जिनालयों में प्रातः 6 बजे से श्रद्धालुओं की आस्था का जनसैलाब उमड़े देखा गया और उपस्थित श्रावकों द्वारा स्वर्ण एवं रजत कलशों श्रीजी के कलशाभिषेक एवं शांतिधारा कर नित्य नियम पूजन के साथ उत्तम तप धर्म का अष्ट द्रव्यों के साथ पूजन किया गया। बुधवार को जैन मंदिरों में दशलक्षण के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म पर्व मनाया जाएगा, इस दौरान श्रद्धालुओं द्वारा तीन दिनों के झर के तेले का निर्जल उपवास भी प्रारंभ करेंगे।
उत्तम तप धर्म में कर्म क्षयार्थे तपयते इति तप: कर्मो के क्षय के लिए जो तपा जाय उसे तप कहते हैं। तप 12 प्रकार के होते है। 6 अन्तरंग और 6 बाहा इच्छा का निरोध करना भी तप कहलाता है, कुवासनाओं के संस्कारो मन को परिभुक्त हो जाने का नाम भी तप होता है। अनशन, अवमोदर्य, व्रति परिसंख्यान, रस परित्याग, काय कलेश, विकित शच्यासन से 6 बाहय तप कहलाते है और प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्त, स्वाध्याय, व्यूतसर्ग और ध्यान ये 6 अन्तरंग तप कहलाते है।
अभिषेक जैन बिट्टू के अनुसार तप शारीरिक शक्ति अनुसार होता है, तप के प्रभाव में आने वाले कर्म भी रुकते है तथा पूर्व के संचित कर्म भी नष्ट होते है। मुक्ति का वरण करने के लिए तपना जरुरी है, जिस प्रकार दूध को गरम करने के लिए बर्तन का गरम होना बहुत जरुरी है उसी प्रकार आत्मा को शुद्ध करने के लिए शरीर की तपस्या भी बहुत जरुरी है तभी आत्मा प्रकाशित और प्रवज्जलित होगी। क्योकि तप ध्यान में भी कारण है अतः तप के द्वारा कर्म क्षय करना चाहिए।
